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Thursday, June 9, 2016

Kahani बैताल पच्चीसी

बहुत पुरानी बात है। धारा नगरी में गंधर्वसेन नाम का एक राजा रहा  करते थे। उसके चार रानियाँ थीं। उनके छ: लड़के थे जो सब-के-सब बड़े ही चतुर और बलवान थे।  एक दिन राजा की मृत्यु हो गई और उनकी जगह उनका बड़ा बेटा शंख गद्दी पर बैठा। उसने कुछ दिन राज किया, लेकिन छोटे भाई विक्रम ने उसे मार डाला और स्वयं राजा बन बैठा। उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता गया और वह सारे जम्बूद्वीप का राजा बन बैठा। एक दिन उसके मन में आया कि उसे घूमकर सैर करनी चाहिए और जिन देशों के नाम उसने सुने हैं, उन्हें देखना चाहिए। सो वह गद्दी अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर, योगी बन कर, राज्य से निकल पड़ा।


उस नगर में एक ब्राह्मण तपस्या करता था। एक दिन देवता ने प्रसन्न होकर उसे एक फल दिया और कहा कि इसे जो भी खायेगा, वह अमर हो जायेगा। ब्रह्मण ने वह फल लाकर अपनी पत्नी को दिया और देवता की बात भी बता दी। ब्राह्मणी बोली, “हम अमर होकर क्या करेंगे? हमेशा भीख माँगते रहेंगें। इससे तो मरना ही अच्छा है। तुम इस फल को ले जाकर राजा को दे आओ और बदले में कुछ धन ले आओ।”


यह सुनकर ब्राह्मण फल लेकर राजा भर्तृहरि के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। भर्तृहरि ने फल ले लिया और ब्राह्मण को एक लाख रुपये देकर विदा कर दिया। भर्तृहरि अपनी एक रानी को बहुत चाहता था। उसने महल में जाकर वह फल उसी को दे दिया। रानी की मित्रता शहर-कोतवाल से थी। उसने वह फल कोतवाल को दे दिया। कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था। वह उस फल को उस वेश्या को दे आया। वेश्या ने सोचा कि यह फल तो राजा को खाना चाहिए। वह उसे लेकर राजा भर्तृहरि के पास गई और उसे दे दिया। भर्तृहरि ने उसे बहुत-सा धन दिया; लेकिन जब उसने फल को अच्छी तरह से देखा तो पहचान लिया। उसे बड़ी चोट लगी, पर उसने किसी से कुछ कहा नहीं। उसने महल में जाकर रानी से पूछा कि तुमने उस फल का क्या किया। रानी ने कहा, “मैंने उसे खा लिया।” राजा ने वह फल निकालकर दिखा दिया। रानी घबरा गयी और उसने सारी बात सच-सच कह दी। भर्तृहरि ने पता लगाया तो उसे पूरी बात ठीक-ठीक मालूम हो गयी। वह बहुत दु:खी हुआ। उसने सोचा, यह दुनिया माया-जाल है। इसमें अपना कोई नहीं। वह फल लेकर बाहर आया और उसे धुलवाकर स्वयं खा लिया। फिर राजपाट छोड, योगी का भेस बना, जंगल में तपस्या करने चला गया।


भर्तृहरि के जंगल में चले जाने से विक्रम की गद्दी सूनी हो गयी। जब राजा इन्द्र को यह समाचार मिला तो उन्होंने एक देव को धारा नगरी की रखवाली के लिए भेज दिया। वह रात-दिन वहीं रहने लगा।

भर्तृहरि के राजपाट छोड़कर वन में चले जाने की बात विक्रम को मालूम हुई तो वह लौटकर अपने देश में आया। आधी रात का समय था। जब वह नगर में घुसने लगा तो देव ने उसे रोका। राजा ने कहा, “मैं विक्रम हूँ। यह मेरा राज है। तुम रोकने वाले कौन होते होते?”


देव बोला, “मुझे राजा इन्द्र ने इस नगर की चौकसी के लिए भेजा है। तुम सच्चे राजा विक्रम हो तो आओ, पहले मुझसे लड़ो।”


दोनों में लड़ाई हुई। राजा ने ज़रा-सी देर में देव को पछाड़ दिया। तब देव बोला, “हे राजन्! तुमने मुझे हरा दिया। मैं तुम्हें जीवन-दान देता हूँ।”

इसके बाद देव ने कहा, “राजन्, एक नगर और एक नक्षत्र में तुम तीन आदमी पैदा हुए थे। तुमने राजा के घर में जन्म लिया, दूसरे ने तेली के और तीसरे ने कुम्हार के। तुम यहाँ का राज करते हो, तेली पाताल का राज करता था। कुम्हार ने योग साधकर तेली को मारकर शम्शान में पिशाच बना सिरस के पेड़ से लटका दिया है। अब वह तुम्हें मारने की फिराक में है। उससे सावधान रहना।”


इतना कहकर देव चला गया और राजा महल में आ गया। राजा को वापस आया देख सबको बड़ी खुशी हुई। नगर में आनन्द मनाया गया। राजा फिर राज करने लगा।

एक दिन की बात है कि शान्तिशील नाम का एक योगी राजा के पास दरबार में आया और उसे एक फल देकर चला गया। राजा को आशंका हुई कि देव ने जिस आदमी को बताया था, कहीं यह वही तो नहीं है! यह सोच उसने फल नहीं खाया, भण्डारी को दे दिया। योगी आता और राजा को एक फल दे जाता।

संयोग से एक दिन राजा अपना अस्तबल देखने गया था। योगी वहीं पहुँच और फल राजा के हाथ में दे दिया। राजा ने उसे उछाला तो वह हाथ से छूटकर धरती पर गिर पड़ा। उसी समय एक बन्दर ने झपटकर उसे उठा लिया और तोड़ डाला। उसमें से एक लाल निकला, जिसकी चमक से सबकी आँखें चौंधिया गयीं। राजा को बड़ा अचरज हुआ। उसने योगी से पूछा, “आप यह लाल मुझे रोज़ क्यों दे जाते हैं?”

योगी ने जवाब दिया, “महाराज! राजा, गुरु, ज्योतिषी, वैद्य और बेटी, इनके घर कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”

राजा ने भण्डारी को बुलाकर पीछे के सब फल मँगवाये। तुड़वाने पर सबमें से एक-एक लाल निकला। इतने लाल देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ। उसने जौहरी को बुलवाकर उनका मूल्य पूछा। जौहरी बोला, “महाराज, ये लाल इतने कीमती हैं कि इनका मोल करोड़ों रुपयों में भी नहीं आँका जा सकता। एक-एक लाल एक-एक राज्य के बराबर है।”

यह सुनकर राजा योगी का हाथ पकड़कर गद्दी पर ले गया। बोला, “योगीराज, आप सुनी हुई बुरी बातें, दूसरों के सामने नहीं कही जातीं।”

राजा उसे अकेले में ले गया। वहाँ जाकर योगी ने कहा, “महाराज, बात यह है कि गोदावरी नदी के किनारे मसान में मैं एक मंत्र सिद्ध कर रहा हूँ। उसके सिद्ध हो जाने पर मेरा मनोरथ पूरा हो जायेगा। तुम एक रात मेरे पास रहोगे तो मंत्र सिद्ध हो जायेगा। एक दिन रात को हथियार बाँधकर तुम अकेले मेरे पास आ जाना।”

राजा ने कहा “अच्छी बात है।”

इसके उपरान्त योगी दिन और समय बताकर अपने मठ में चला गया।

वह दिन आने पर राजा अकेला वहाँ पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

योगी ने कहा, “राजन्, “यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर मसान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा लटका है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”

यह सुनकर राजा वहाँ से चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन राजा हिम्मत से आगे बढ़ता गया। जब वह मसान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे किर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।

राजा ने नीचे आकर पूछा, “तू कौन है?”

राजा का इतना कहना था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा। राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी वह मुर्दा फिर पेड़ पर जा लटका। राजा फिर चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। बोला, “बता, तू कौन है?”

मुर्दा चुप रहा।

तब राजा ने उसे एक चादर में बाँधा और योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है?”

राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”

बेताल बोला, “मैं एक शर्त पर चलूँगा। अगर तू रास्ते में बोलेगा तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा।”

राजा ने उसकी बात मान ली। फिर बेताल बोला, “ पण्डित, चतुर और ज्ञानी, इनके दिन अच्छी-अच्छी बातों में बीतते हैं, जबकि मूर्खों के दिन कलह और नींद में। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”

Sunday, June 5, 2016

Akbar Birbal

बुद्धिमान, हाजिर जवाब और लोगों को लाजवाब कर देने वाले शहंशाह अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल का नाम महेशदास दुबे था और वो मध्यप्रदेश के सीधी जिले के घोघरा में पैदा हुए थे।

दिन, महीने और साल दर साल बीतते चले गए मगर आज भी मध्यप्रदेश के सीधी जिले में सोन नदी के पार बसा घोघरा कमोबेश वैसा ही है जैसा कई सौ साल पहले हुआ करता था। कच्चे मकान, टूटी-फूटी सडकें और उपेक्षा मानों इस इलाके की नियति बनकर रह ई हो।

कहा जाता है कि घोघरा गांव में ही बीरबल के पिता गंगादास का घर हुआ करता था और यहीं उनकी माता अनाभा देवी ने वर्ष 1528 में रघुबर और महेश नाम के जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। घोघरा गांव सालों से उपेक्षित ही रहा और इसके साथ-साथ उपेक्षित रहे बीरबल की पीढ़ी के लोग।

उपेक्षित : बीरबल की 37 वीं पीढ़ी भी इसी गांव में रह रही है और ये लोग मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं।

सीधी के रहने वाले साधू यादव कहते हैं कि इस परिवार से मिलने ज्यादातर शोधकर्ता ही आते हैं। सरकारी अधिकारी और नेताओं को बीरबल के परिवार से कोई सरोकार नहीं है।

लोगों को अफसोस है कि सालों साल दिल्ली की गद्दी पर बैठी सरकार हो या फिर प्रदेश की। किसी ने बीरबल की जन्मस्थली घोघरा के बारे में नहीं सोचा।

अलबत्ता जब अर्जुन सिंह केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री हुआ करते थे तो उन्होंने बीरबल की याद में एक सामुदायिक भवन का निर्माण करवाया। इसके अलावा घोघरा की पहचान के लिए कोई अलग पहल नहीं की गई।

गांव के बुजुर्गों का कहना हैं कि अकबर के जमाने में घोघरा महत्वपूर्ण रहा। मगर बाद में वक्त बदलता चला गया और अहिस्ता-अहिस्ता इस जगह की अहमियत कम होने लगी। अकबर के बाद दिल्ली और प्रदेश की सरकारों ने कभी इस गांव की तरफ मुड़कर भी नहीं देखा।

एक नौजवान लड़के ने इस गांव से चलकर दिल्ली के दरबार तक का सफर तय किया। आज कई सालों के बाद भी दिल्ली की सरकारें घोघरा तक नहीं पहुंच पाई हैं।

बीरबल के वंशज : गांव वालों से बात करते-करते, मैं बीरबल के वंशजों के घर आ पहुंचा। छोटे से बगीचे में बसा कच्चा मकान। यहां मेरी मुलाकात बीरबल की 36वीं पीढ़ी के गंगा दुबे से हुई जो पेशे से किसान हैं और गांव में एक छोटी-सी परचून की दुकान भी चलाते हैं।

गंगा दुबे बताते हैं कि कई सालों तक बीरबल से जुड़े कई दस्तावेज उनके पास पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रहे। मगर हाल ही में उनकी दुकान में पानी भर गया और उनमें से कुछ दस्तावेज नष्ट हो गए।

इन दस्तावेजों में रीवा के महाराजा का पत्र और अकबर के दरबार का हुक्म-नामा शामिल थे जो फारसी में लिखे हुए थे। गंगा के परिवार के पास बीरबल की कुछ दूसरी यादगार चीजें आज भी मौजूद हैं। मसलन शंख, घंटा और कुछ किताबें।

कहते हैं कि बीरबल फारसी और संस्कृत के विद्वान थे और कविताएं भी लिखा करते थे। इसके अलावा उनकी शिक्षा संगीत में भी हुई थी। यही वजह है कि सबसे पहले उन्हें जयपुर के महाराज के दरबार में और बाद में रीवा के महाराज के दरबार में बतौर राज कवि रखा गया था।


गांववालों का कहना है कि दरअसल रीवा के महाराज ने ही बादशाह अकबर को बीरबल तोहफे के रूप में दिया था। मगर इतिहासकार इससे सहमत नहीं हैं।

यादें : बीरबल की इस जन्मस्थली में उनसे जुड़ी यादगार चीजें लगभग अब नहीं के बराबर हैं। वक्त के साथ सब कुछ खत्म होता चला गया। गांव के तालाब के किनारे वो घर जिसमें उनके माता पिता रहते थे, अब नहीं है।

ये जगह अब एक वीरान टीला है जहां जानवर चरते रहते हैं। कभी कभी गांव के नौजवान तालाब के किनारे इस टीले पर बैठकर अपना समय बिताते हैं।

अगर इतने सालों में इस गांव में कुछ नहीं बदला तो वो है घोघरा का प्राचीन मंदिर जहां बीरबल और उनके भाई जाया करते थे। इस प्राचीन देवी के मंदिर के वयोवृद्ध पुजारी सुख्चंद्र सिंह का कहना है कि ऐसी मान्यता है कि यहीं से बीरबल को वरदान मिला था।

वो कहते हैं : पहले ये मंदिर तालाब के किनारे था, बाद में देवी की मूर्ती को यहां स्थापित किया गया।

बीरबल का कोई बेटा नहीं था। कहा जाता है कि उनकी सिर्फ एक बेटी थी कमला, जिसने शादी नहीं की थी। इसलिए आज उनके भाई रघुबर ही उनके वंश को चला रहे हैं। घोघरा में ये विशवास है कि ऐसा देवी के वरदान की वजह से ही हुआ होगा।

सम्मान : गंगा दुबे के घर की बैठक में लोगों का आना जान लगा रहता है। बीरबल के वंशज होने की वजह से पूरे इलाके में उनका काफी सम्मान भी है। लोग उनके घर को फक्र के साथ देखते हैं और अक्सर इनके यहां गांव वालों की लंबी लंबी बैठकें भी होती हैं।

इनका परिवार भी खिचड़ी का शौकीन है। मगर गंगा कहते हैं कि उनके घर पर खिचड़ी जल्दी बन जाती। वो हंसते हुए कहते हैं, 'बीरबल की खिचड़ी तो कभी बन नहीं पाई। वो तो बादशाह अकबर की नसीहत के लिए खिचड़ी बना रहे थे। मगर हमारी खिचड़ी तो जल्द बन जाती है।'

घोघरा में बीरबल और अकबर की नोक झोंक लगभग हर जुबां पर है। सीधी जिले के इस सुदूर इलाके में कभी बिजली रहती है कभी नहीं। गांव के लोग खाली समय में अकबर और बीरबल के किस्सों से ही अपना दिल बहलाते हैं।

गंगा दुबे इस गांव में अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ रहते हैं। इनकी दो बेटियां भी हैं जिनकी शादी हो चुकी है। बस किसी तरह इस परिवार का गुजर बसर चलता है। यूं कहा जा सकता है कि बीरबल के इस गांव को आज है किसी अकबर का इंतजार।
Emperor Akbar and Birbal
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बादशाह को मजाक करने की आदत थी। एक दिन उन्होंने नगर के सेठों से कहा- आज से तुम लोगों को पहरेदारी करनी पड़ेगी। सुनकर सेठ घबरा गए और बीरबल के पास पहुंच कर अपनी फरियाद रखी।

बीरबल ने उन्हें हिम्मत बंधाई- तुम सब अपनी पगड़ियों को पैर में और पायजामों को सिर पर लपेटकर रात्रि के समय में नगर में चिल्ला-चिल्ला कर कहते फिरो, अब तो आन पड़ी है।

Akbar Birbal

शेर खां को मुगलों ने पकड़ लिया और उसे अकबर के पास ले गए...।
 

अकबर ने कहा- इसको बंदी बना दिया जाए...! 
शेर खां ने कहा- नहीं, नहीं जहांपनाह !
.... 
.... 
रहम करो !!! मुझे बंदा ही रहने दो। 

Akbra Birbal



 
निकले यात्रा पर ईरान, रुके वह वहां के नवाब के बनकर मेहमान। दो दिन रूके वह दोनों, खूब हुई खातिरदारी, फिर आई वापिस लौटने की बारी। नवाब ने बीरबल को जान चतुर सुजान, किया एक टेढ़ा-सा सवाल। 
 
उन्होंने पूछा- 'मेरे एक सवाल का जवाब दोगे? अपने शहंशाह और मेरी तारीफ एक साथ कैसे करोगे?' 
 
बीरबल थोड़ा सोच में पड़ गए, फिर उनकी अकल के ताले खुल गए।
 
बीरबल ने दिया जवाब, 'आप दोनों ही चांद हैं जनाब। मेरे शहंशाह हैं तो आप हैं पूरा चांद!' 
 
जवाब सुनकर ईरान के नवाब बेहद खुश हो गए, लेकिन अकबर उस समय कुछ न बोले गुमसुम हो गए। रास्ते भर अकबर रहे बीरबल से बेहद खफा, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था उसका फलसफा। 
 
अकबर की नाराजी को बीरबल ताड़ गए, क्यों हैं शहंशाह खफा, कारण भी जान गए। 
 
बोले- 'महाराज आप कुछ सोच रहे हैं, मन ही मन मुझे कोस रहे हैं। पर मैं बताता हूं आपको सच, आपकी तरक्की के बारे में ही सोचता हूं मैं बस। उनको कहा मैंने पूरा चांद, जो धीर-धीरे घटने लगता है श्रीमान। पर आपको बताया चौथ का चांद जो हर रात बढ़ता है और बढ़ता है जिसका मान। आप तो बढ़ते ही जाएंगे और जगह-जगह अपना मकाम बनाएंगे। अब कहिए तो सही, मैंने कौन-सी गलत बात कही?'
 
बीरबल की बात सुनकर अकबर मुस्कुरा दिए, एक बार फिर का लोहा मान गए।

Akbar Birbal


कभी जरूरत से, कभी मनोरंजन के लिए बीरबल से कठिन प्रश्न करता।
एक दिन बादशाह ने पूछा- 'तुम्हें तीक्ष्ण बुद्धि कहां से मिली?'
बीरबल- 'जहांपनाह, यह मुझे मूर्खों से मिली है!'
प्रश्न जितना सरल, उत्तर उतना ही ज्यादा उलझन और चक्कर में डालने वाला, हैरान करने वाला! के पास तो बुद्धि होती ही नहीं, बुद्धि होती तो वे मूर्ख क्यों कहलाते। और जो चीज जिसके पास में नहीं है, उसे वे कैसे दूसरे को दे सकते हैं? अत: अकबर से रहा नहीं गया। 
बादशाह अकबर ने पूछा- 'मूर्खों से?'
बीरबल- 'हां! मूर्खों से।' जिस आचरण और व्यवहार के कारण आदमी मूर्ख कहलाता है, मैं उनसे बचता रहा। इससे मेरा बुद्धिमान बनने का रास्ता साफ होता ग

Akbar Birbal

एक दिन बादशाह महल के बागों में सैर कर रहे थे। फले-फूले बाग को देखकर बादशाह अकबर बहुत खुश थे। वे बीरबल से बोले, 'बीरबल, देखो यह बैंगन, कितनी सुंदर लग रहे हैं!' इनकी सब्जी कितनी स्वादिष्ट लगती है!
बीरबल, मुझे बैंगन बहुत पसंद हैं।

Friday, May 27, 2016

अकबर बिरबल रोचक कथा



सम्राट अकबर कभी जरूरत से, कभी मनोरंजन के लिए बीरबल से कठिन प्रश्न करता।

एक दिन बादशाह ने पूछा- 'तुम्हें तीक्ष्ण बुद्धि कहां से मिली?'

बीरबल- 'जहांपनाह, यह मुझे मूर्खों से मिली है!'

प्रश्न जितना सरल, उत्तर उतना ही ज्यादा उलझन और चक्कर में डालने वाला, हैरान करने वाला! मूर्ख के पास तो बुद्धि होती ही नहीं, बुद्धि होती तो वे मूर्ख क्यों कहलाते। और जो चीज जिसके पास में नहीं है, उसे वे कैसे दूसरे को दे सकते हैं? अत: अकबर से रहा नहीं गया। 

बादशाह अकबर ने पूछा- 'मूर्खों से?'

बीरबल- 'हां! मूर्खों से।' जिस आचरण और व्यवहार के कारण आदमी मूर्ख कहलाता है, मैं उनसे बचता रहा। इससे मेरा बुद्धिमान बनने का रास्ता साफ होता गया।
 

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